सोमवार, अप्रैल 26, 2010

तुम्हारे लिए...


मैंने कब कहा
तुमसे,
तुम आकाश हो जाओ
मेरे लिए.....
पर
मैं-
धरती होना चाहती हूँ
तुम्हारे लिए........ "

रविवार, फ़रवरी 08, 2009

peter korman


चाहे कुछ भी घटित हो : लिखो

........................................

अगर तुम्हारे शरीर मे अंधकार घिर आता है

तो लिखो उस रौशनी के बारे मे

जो बाहर खङी इन्तजार करती है........

सोमवार, फ़रवरी 02, 2009

मुकुटधर पाण्डेय

इनका जन्म 1815 ईस्वी मे बालपुर, विलासपुर मे हुआ था। अपने अग्रज लोचनप्रसाद पाण्डेय की प्रेरणा से इन्होने 1909 ईस्वी मे लेख-कवितायें आदि लिखना प्रारम्भ किया। द्विवेदी कालिन पत्रिका "सरस्वती" आदि अन्य पत्रिकाओ मे इनकी रचनाये प्रमुखता से छपती रही हैं। प्रथम काव्य संकलन 'पूजा-फूल' नाम से प्रकाशित हुआ। 'कानन-कुसुम', 'शैल बाला', 'समाज कंटक', 'लछमा', 'परिश्रम', तथा 'ह्रदय-दान' नमक पुस्तके भी उल्लेखनीय हैं। इन्होने उच्च मानवीय मूल्यों पर बल देते हुए उपदेश की जगह आंतरिक संवेदना जगाने तथा भावात्मकता को प्रधानता दी हैं।इनकी एक प्रमुख कविता 'कवि' शीर्षक से नीचे प्रस्तुत हैं।

कवि


बतलाओ, वह कौन है जिसको कवि कहता सारा संसार?
रख देता शब्दों को क्रम से, घटा-बढ़ा जो किसी प्रकार।
क्या कवि वही? काव्य किसलय क्या उसका ही लहराता है,
जिसके यशः सुमन-सौरभ से निखिल विश्व भर जाता है।
नहीं, नहीं, मेरे विचार में कवि तो है उसका ही नाम
यम-दम-संयम के पालन युत होते हैं जिसके सब काम।
रहती है कल्पना–कामिनी जिसके हृदय-कमल आसीन
संचारित करती सदैव जो भाँति-भाँति के भाव नवीन।
भूत, भविष्यत्, वर्तमान पर होती है जिसकी सम दृष्टि
प्रतिभा जिसकी मर्त्यधाम में करती सदा सुधा की वृष्टि।
जो करुणा श्रृंगार, हास्य वीरादि नवों रस का आधार
जिसको ईश्वरीय तत्वों का अनुभव युत है ज्ञान-अपार।
जिसकी इच्छा से अरण्य में रम्य फूल खिल जाता है
नंदन वन से पारिजात की लता छीन जो लाता है।
मरीचिका-मय मरुस्थली में जिसकी आज्ञा के अनुसार
कलकल नादपूर्ण बहती है अतिशय शीतल जल की धार।
(सरस्वती, अक्टूबर 1919 में प्रकाशित)

रविवार, नवंबर 02, 2008

श्रीधर पाठक


1859 ई॰ आगरा के जोंधरी गाव मे जन्मे श्रीधर पाठक प्राकृतिक सौंदर्य, स्वदेश प्रेम तथा समाजसुधार की भावनाओ के कवि थे। इनकी रचनाये क्रमशः इस तरह हैं : मनोविनोद(भाग-1,2,3), धन विनय (1900), गुनवंत हेमंत(1900), वनाषटक( 1912),देहरादून(1915),गोखले गुनाषटक( 1915) इत्यादि । इनकी एक बाल-कविता प्रस्तुत हैं।
देल छे आए
बाबा आज देल छे आए,
चिज्जी पिज्जी कुछ ना लाए।
बाबा क्यों नहीं चिज्जी लाए,
इतनी देली छे क्यों आए।
कां है मेला बला खिलौना,
कलाकंद, लड्डू का दोना।
चूं चूं गाने वाली चिलिया,
चीं चीं करने वाली गुलिया।
चावल खाने वाली चुहिया,
चुनिया-मुनिया, मुन्ना भइया।
मेला मुन्ना, मेली गैया,
कां मेले मुन्ना की मैया।
बाबा तुम औ कां से आए,
आं आं चिज्जी क्यों ना लाए।
-श्रीधर पाठक( 1860 )

बुधवार, अक्टूबर 15, 2008

मैथिलीशरण गुप्त : हमारे राष्ट्रिय कवि


गुप्त जी का जन्म 1886 ईसवी, चिरगाव, झासी, उत्तरप्रदेश मे हुआ था। इनकी प्रथा रचना "भारत-भरती" 1912 ईसवी मे निकली और इस पुस्तक ने हिन्दी भाषियो मे अपनी जाती और देश के प्रति गर्व और गौरव की भावनाए जगाई। तभी से ये राष्ट्रकवि के रूप मे विख्यात है।

सखी वे मुझसे कह कर जाते.....


सखी वे मुझसे कह कर जाते ,
कह तो क्या वे मुझको अपनी पग बाधा ही पाते ?
मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना ?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन मे लाते !
सखी वे मुझसे कह कर जाते !
स्वयं सुसज्जित कर के क्षण मे ,
प्रियतम को प्राणों के पण मे ,
हमी भेज देती है रण मे -
क्षात्र धर्म के नाते !
सखी वे मुझसे कह कर जाते !
हुआ न यह भी भाग्य अभागा ,
किस पर विफल गर्व अब जागा ?
जिसने अपनाया था, त्यागा ;
रहे स्मरण ही आते !
सखी वे मुझसे कह कर जाते !
नयन उन्हें है निष्ठुर कहते ,
पर इनसे आंसू जो बहते ,
सदय ह्रदय वे कैसे सहते ?
गए तरस ही खाते !
सखी वे मुझसे कह कर जाते !
जाये , सिद्धि पावे वे सुख से ,
दुखी न हो इस जन के दुःख से ,
उपालम्भ दू मैं किस मुख से ?
आज अधिक वे भाते !
सखी वे मुझसे कह कर जाते !
गए लौट भी वे आवेगे ,
कुछ अपूर्व, अनुपम लावेगे ,
रोते प्राण उन्हें पावेगे,
पर क्या गाते गाते ?
सखी वे मुझसे कह कर जाते !