शुक्रवार, अगस्त 20, 2010

दुःख..

 कुछ नहीं कहते न रोते हैं 
दुख पिता की तरह होते हैं।
इस भरे तालाब-से बाँधे हुए मन में
 धुँआते-से रहे ठहरे जागते तन में,
लिपट कर हम में बहुत चुपचाप सोते हैं....'अशेष'

2 टिप्‍पणियां:

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा आपने.बधाई.

RAHUL- DILSE -2 ने कहा…

bahut accha laga. ekdum apne jaisa... apno ki tarah..