रविवार, अक्तूबर 02, 2011

chand...


  सुनो, वो जो

  दरख्तों के खुले दरीचों से-

  झाकता हुआ चाँद दिया था 

  तुमने मुझे.

  के,

 धूलि-धूलि आँखों से,

 पूछता है वही  आज -

 मुझसे अपने होने का अर्थ... 
 

1 टिप्पणी:

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

http://madan-saxena.blogspot.in/
http://mmsaxena.blogspot.in/
http://madanmohansaxena.blogspot.in/